सोमवार 26 अक्टूबर 2026 - 18:21
जम्मू-कश्मीर में अय्याम-ए-फ़ातिमिया के अवसर पर हसनाबाद के ऐतिहासिक इमामबाड़े में मजलिस का आयोजन

कुरआन और अहलेबैत की शिक्षाओं से जुड़ाव ही मार्गदर्शन के रास्ते पर दृढ़ रहने की गारंटी है : आगा सैयद मुजतबा अब्बास मूसा्वी सफवी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर के ऐतिहासिक इमामबाड़ा हसनाबाद में अंजुमन-ए-शरीअत शियान के तत्वावधान में अय्याम-ए-फ़ातिमिया और प्रख्यात धर्मगुरु हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन आगा सैयद मुहम्मद हुसैन मूसा्वी सफवी की बरसी के अवसर पर मजलिस-ए-अज़ा का आयोजन किया गया। इसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं और अज़ादारों ने भाग लिया।

इस अवसर पर अंजुमन-ए-शरीअत शियान के महासचिव हुज्जतुल इस्लाम आगा सैयद मुजतबा अब्बास मूसा्वी सफवी ने अपने संबोधन में ईमान को मजबूत बनाने, नैतिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने तथा पवित्र कुरआन और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की शिक्षाओं से गहरा जुड़ाव बनाए रखने पर जोर दिया।

कुरआन की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए आगा सैयद मुजतबा अब्बास मूसा्वी सफवी ने कहा कि सत्य और असत्य के बीच संघर्ष प्रत्येक ईश्वरीय मिशन के साथ रहा है। उन्होंने मोमिनों को वैचारिक और नैतिक सूझबूझ विकसित करने की सलाह दी, ताकि वे सत्य, मार्गदर्शन और नेकी को पहचान सकें, धोखे और अन्याय का मुकाबला कर सकें तथा उन शक्तियों के सामने दृढ़ता से खड़े रहें, जो ईमान और नैतिक मूल्यों को कमजोर करने का प्रयास करती हैं।

उन्होंने अपने संबोधन में विलायत और पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम के पवित्र परिवार से जुड़ाव के महत्व पर विशेष बल दिया। इस दौरान अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम और अन्य इमामों अलैहिमुस्सलाम के आध्यात्मिक मार्गदर्शन को भी प्रमुखता से रेखांकित किया गया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अहलेबैत से जुड़ाव केवल भावनात्मक श्रद्धा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह एक व्यावहारिक प्रतिबद्धता है, जो नमाज, इबादत, हलाल जीवनशैली अपनाने, पापों से बचने और धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने के रूप में दिखाई देनी चाहिए।

आगा सैयद मुजतबा अब्बास मूसा्वी सफवी ने इस कुरआनी वादे की ओर भी ध्यान दिलाया कि ईमान और नेक अमल के परिणामस्वरूप अंततः सत्य को विजय प्राप्त होती है। उन्होंने आशा के इस संदेश को इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़हूर से संबंधित शिया आस्था के साथ जोड़ते हुए कहा कि असत्य और अत्याचार हमेशा कायम नहीं रह सकते।

हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्होंने उनके उच्च आध्यात्मिक स्थान और मार्गदर्शन, बलिदान, पवित्रता तथा दृढ़ता के शाश्वत संदेश को उजागर किया। उन्होंने कहा कि मजलिस-ए-अज़ा का उद्देश्य इन मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को फिर से मजबूत करना होना चाहिए। साथ ही, समाज में ईमान, न्याय और सैद्धांतिक आचरण की नींव को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने याद दिलाया कि पवित्र कुरआन सत्य और असत्य, मित्रता और शत्रुता तथा मार्गदर्शन और गुमराही के बीच अंतर करने का मूल आधार है। उन्होंने मोमिनों से अपील की कि वे अपनी धार्मिक समझ को गहरा करें, अपनी आध्यात्मिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करें और अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम द्वारा प्रस्तुत मूल्यों के प्रति निष्ठावान बने रहें।

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